Sunday, 4 July 2010

पतंगा

जबसे तुमको देखा है ,मरने की बस इच्छा है।
इक नदी बौराई तू , शांत मेरा दरिया है।
तेरी यादें ही सनम ,अब तो मेरी दुनिया है।
साहिलों से डरता हुं , लहरों से अब रिश्ता है।
हमको जब माना ख़ुदा ,हमसे ही क्यूं पर्दा है।
धक्का दे कर अपनों को,आगे हमको बढना है।
दूर जबसे तू गई , बज़्म मेरा तन्हा है।
चोरी मेरी भी अदा , बस तलाशे मौक़ा है ।
मैं पतंगा तो नही ,फिर भी मुझको जलना है।
दोनों की ख़्वाहिश यही,दानी से बस मिलना है।

Friday, 2 July 2010

सज़ा दो

मेरे क़ातिल का मुझे कोई पता दो , या उसे मेरी तरफ़ से दुआ दो।

मैं चराग़ों की हिफ़ाज़त कर रहा हूं ,बात ये सरकश हवाओं को बता दो।

बेवफ़ा कह के घटाओ मत मेरा कद, है वफ़ा की चाह तो ख़ुद भी वफ़ा दो।

छोड़ कर जाने के पहले ऐ सितमगर,इक अदा सच्ची मुहब्बत की दिखा दो।

जीते जी गर दूरी ज़ायज थी जहां में, कांधा तो मेरे जनाज़े को लगा दो।

ये किनारे बेरहम हैं बदगुमां हैं , कश्तियों, मंझधार को अपनी बना लो।

चांदनी से चांद की इज़्ज़त है जग मे , रौशनी दो या अंधेरों की सज़ा दो।

ज़िन्दगी कुर्बान है कदमों मे तेरे , ऐ ख़ुदा मरने का मुझको हौसला दो।

प्यार में दरवेशी का आलम है दानी, मिल सको ना तो तसव्वुर की रज़ा दो।

Thursday, 1 July 2010

बे-वफ़ाई

अब बेवफ़ाई, इश्क़ का दस्तूर है , राहे-मुहब्बत दर्द से भरपूर है।
बारिश का मौसम रुख़ पे आया इस तरह,ज़ुल्फ़ों का तेरा दरिया भी मग़रूर है।
ग़म के चमन को रोज़ सजदे करता हूं ,पतझड़ के व्होठों में मेरा ही नूर है।
इस झोपड़ी की यादों में इक ख़ुशबू है ,महलों के रिश्ते भी सनम नासूर हैं।
दिल के समन्दर में वफ़ा की कश्ती है , आंख़ों के साग़र को हवस मन्जूर है।
जब से नदी के पास ये दिल बैठा है , मेरी रगों की प्यास मुझसे दूर है।
चालें सियासत की, तेरे वादों सी , जनता उलझने को सदा मजबूर है।
ग़म के चराग़ो को जला कर बैठा हूं , अब आंधियों का हुस्न बे-नूर है।
दिल राम को तरज़ीह देता है मगर , मन रावणी क्रित्यों में मख़मूर है।

Wednesday, 30 June 2010

वादों का सफ़र

तेरे वादों का सफ़र थमने लगा है ,मेरा दिल ये मुन्तज़र डर सा गया है।
ग़म चराग़ों का उठाऊं रात दिन मैं , पर हवाओं से तेरा टांका भिड़ा है ।
दिल वफ़ा के बरिशों से तर-ब-तर है, बे-वफ़ाई,तेरे दामन की फ़िज़ा है।
क्यूं हवस की गलियों मे तुम घूमती हो,सब्र का रस्ता सुकूं से जब भरा है।
मैं ग़रीबी की गली में ख़ुश्फ़हम हूं ,तू अमीरी कें मकां में भी डरा है।
चांदनी को चांद से गर प्यार है,तो ,आसमानी ज़ुल्मों से लड़ने में क्या है।
बिल्डरों का राज है अब इस वतन में, झोपड़ी का हौसला फिर भी खड़ा है ।
डूबना है हुस्न के सागर में मुझको , टूटी फूटी कश्ती है पर हौसला है।
क्रेज़ मोबाइल का है अब आसमां पे ,हाय चिठ्ठी पत्री की सांसें फ़ना है।

Thursday, 24 June 2010

नामा

लिख मौत के नाम का नामा तेरे घर को ढूंढता हूं ,ग़म से भरा क़तरा हूं अपने समन्दर को ढूंढता हूं।
इक जीत कर जंग क्यूं दिल अभिमान से लबरेज़ तेरा, मैं भी शहंशाह पोरष हूं सिकन्दर को ढूंढ्ता हूं ।
अपनों की मेरी बुलंदी मेरे ही दम से आसमां पे , सबका मुकद्दर सजा अपने मुकद्दर को ढूंढता हूं ।
जब पास थी तवज्जो दे सका ना हमसफ़र को , जब जा चुकी दूर तो उसके तस्व्वुर को ढूंढ्ता हूं।
हमने बनाया जिन्हें जिनके कारण हमने की लड़ाई , यारो उसी बे-ज़ुबां मजबूर ईशवर को ढूंढ्ता हूं।
ज़र जाह ऐसा कमाया, रक्स रखता है ज़माना , अब चाह पाई सुकूं की तो कलन्दर को ढूंढ्ता हूं।
हर रात मैंने अंधेरों के दम से डकैती की दानी , घर में डकैती पड़ी तो मुनव्वर को ढूंढ्ता हूं।

नामा ॥ख़त॥ ज़र-धन॥ जाह-इज़्ज़त॥ रक्स-इर्ष्या॥ मुनव्वर -प्रकाशमान शय॥

Sunday, 20 June 2010

बुलबुल

तेरे तस्व्वुर ने किया पागल मुझे ,कोई दवा भी है नहीं हासिल मुझे।
किरदार मेरा हो चुका दरवेश सा, अपनी खुशी की पहना दे पायल मुझे।
ज़ख्मों की बारिश से बचूं कैसे सनम,प्यारा है तेरी गलियों का दलदल मुझे।
कश्ती मेरी लहरों की दीवानी हुई , मदमस्त साहिल ने किया घायल मुझे ।
तेरी अदाओं ने मुझे मारा है पर , दुनिया समझती अपना ही क़ातिल मुझे।
या मेरी तू चारागरी कर ठीक से , साबूत लौटा दे, या मेरा दिल मुझे ।
झुकना सिखाया वीर पोरष ने मुझे, दंभी सिकन्दर,ना समझ असफ़ल मुझे।
मन्ज़ूर है तेरी ग़ुलामी बा-अदब , है जान से प्यारा तेरा जंगल मुझे ।
तू खुदगरज़ सैयाद ,दानी इश्क़ में, पर मत समझना बेवफ़ा बुलबुल मुझे।

Saturday, 19 June 2010

तेरी ज़ुल्फ़ें

तेरी ज़ुल्फ़ों की फ़िज़ाओं से घिरा हूं ,बेअता बारिश को सजदे कर रहा हूं ।
ये मुहब्बत भी अंधेरी इक गली है ,ठोकरें खाने अकेले चल पड़ा हूं।
तेरी आंखों की नदी भी बेसुकूं है ,दर्द के दरिया में फ़िर भी डूबता हूं ।
सांसें ये कुरबान हैं तेरी हंसी पे ,मैं पतंगा, शमा के घर पे खड़ा हूं ।
फ़िर चरागों का हवाओं से मिलन है, क़ब्र अपना ,अपने हाथों खोदता हूं।
आंखों पे काजल लगाया ना करो , मैं उजालों की निज़ामत में फ़ंसा हूं ।
सरहदों की बंदगी से डरते हो क्यूं , दुश्मनों के कारवां से जा मिला हूं ।
वो दगाबाज़ों के मंदिर में फ़ंसी है , मैं वफ़ा की राह में तनहा हुआ हूं ।
सुर्ख़ तेरे व्होंठ माशा अल्ला दानी , मैं नदी के तट पे प्यासा मरा हूं ।