दिल तेरे ही ग़मों का तलबगार है अब , दर्द गम बे-बसी से मुझे प्यार है अब।
कश्ती-ए-दिल समन्दर मे महफ़ूज़ रहती, खुदगरज़ साहिलों को नमस्कार है अब।
क़ातिलों का अदालत से टांका यूं , गोया मक़्तूल खुद ही ग़ुनहगार है अब।
मैं चरागों को जला कर सर पे रखा हूं , दिल हवाओं से लड़ने तैयार है अब।
क्यूं कयामत अदाओं से ढाती हो हमदम, पास तेरे निगाहों का हथियार है अब।
मेरी कुर्बानी मजनूं से बढ के रहेगी, मेरी लैला हवस मे गिरिफ़्तार है अब।
इश्क़ अब ज़िन्दगी का किनारा नहीं है, बे-वफ़ाई का दरिया है,मंझधार है अब।
उम्र भर रावणी क्रित्य करता रहा मैं, राम का नाम ही पीरी में सार है अब।
दीन की बातें बे-मानी दुनिया में अब, पैसों से दानी सबको सरोकार है अब।
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Sunday, 6 June 2010
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