Showing posts with label माय enemy. Show all posts
Showing posts with label माय enemy. Show all posts

Thursday, 20 May 2010

असमान से दुश्मनी

असमां से मेरी दुश्मनी नहीं है ,
मेरे घर में मगर रौशनी नहीं है।
चाँद को छत पे उतरा तो हूँ ,
साथ उसके मगर चांदनी नहीं है ।
मै खुदा बनने की कर रहाँ हूँ कोशिश ,
मेरे अंदर अभी आदमी नहीं है ।
रोज़ करता हूँ मझधार की इबादत ,
साहिलों के लिए बंदगी नहीं है ।
और की ख्वाहिश में भटक चुके हैं हम सब ,
जबकि हमको ज़रा भी कमी नहीं है। {डॉ संजय दानी दुर्ग}