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Thursday, 20 May 2010

बीती सदी

इक सुलगती हुई आँख मुझ को घूरती है, आज से नाराज़ वो बीती सदी है|
क्यों समंदर रोता है खुद की कमी पे, साहिलों से अच्छी उसकी ज़िन्दगी है|
इस बियाबान शहर को कैसे बसायें, भीड़ में भी तनहा हर एक आदमी है|
सरहदों के पार मेरा दिल गया है, अब परिंदों से मेरी भी दोस्ती है|
खौफ खता हूँ उजालों के करम से, बस अंधेरों के सफ़र में अब ख़ुशी है|
14 मई को 01:47 बजे · रिपोर्ट करें